रायपुर। टेगौर नगर पटवा भवन में चल रही चातुर्मासिक प्रवचनमाला में गुरुवार को उपाध्याय श्री मनीष सागर जी महाराज ने कहा कि जागृति अभ्यास से आती है। गलतियों से सीखकर ही आत्मिक विकास संभव है। उन्होंने कहा कि पाप को आनंद से न मनाएं, बल्कि पश्चाताप करें। मन ही पाप का स्रोत है, इसलिए मन को अच्छा रखें और जीवन में आनंद बनाए रखें।
उपाध्याय भगवंत ने कहा कि संयम प्रमाद से छूटता है, इसलिए प्रमाद से बचें और संयम बनाए रखें। धर्म का उद्देश्य केवल प्रवचन सुनना नहीं, बल्कि जागरूक होकर उसे जीवन में उतारना है। पाप का कारण राग, द्वेष और मोह है। इन्हें समझकर ही कर्म पर विजय संभव है।
उन्होंने कहा कि पुण्य का उदय समाधान नहीं, सिर्फ सहारा है। स्वस्थ मन और शरीर से ही धर्म और तप हो सकता है। बुद्धि से शुद्धि और शुद्धि से सिद्धि मिलती है। आनंद को बनाए रखने के लिए दूसरों को दुख न दें और खुद भी दुखी न हों।
तपस्वियों का सम्मान
धर्मसभा में 29 उपवास पूर्ण करने वाले तपस्वी ज्ञानमल बाघमार व श्रीमती उषा राखेचा का सम्मान किया गया। समिति अध्यक्ष श्यामसुंदर बैदमुथा ने बताया कि शुक्रवार को आध्यात्म योगी महेंद्र सागर जी महाराज का प्रवचन होगा।

